हिंदी पत्रकारिता में कार्टूनिस्टों की भूमिका केवल मनोरंजन तक सीमित नहीं रही है, बल्कि वे सामाजिक चेतना, राजनीतिक आलोचना और लोकतांत्रिक विमर्श के सशक्त संवाहक रहे हैं। कार्टून दृश्यात्मक पत्रकारिता का ऐसा माध्यम है, जो न्यूनतम रेखाओं, संकेतों और प्रतीकों के माध्यम से जटिल सामाजिक–राजनीतिक यथार्थ को सहज, प्रभावी और मारक रूप में प्रस्तुत करता है। इसी कारण हिंदी पत्रकारिता के विकास में कार्टूनिस्टों की भूमिका को अनदेखा नहीं किया जा सकता।
आज़ादी से पहले हिंदी पत्रकारिता में
कार्टूनिस्टों की भूमिका
औपनिवेशिक काल में हिंदी पत्रकारिता मुख्यतः प्रतिरोध और
राष्ट्रीय चेतना के निर्माण का माध्यम थी। इस दौर में कार्टूनिस्टों ने ब्रिटिश
शासन की दमनकारी नीतियों, सामाजिक शोषण और सांस्कृतिक वर्चस्व पर व्यंग्यात्मक प्रहार किए।
प्रत्यक्ष राजनीतिक आलोचना पर सेंसरशिप के कारण कार्टून प्रतीकों और रूपकों की
भाषा में विरोध व्यक्त करने का सुरक्षित और प्रभावी माध्यम बने।
‘अवध पंच’, ‘उर्दू पंच’,
‘मतवाला’, ‘भारत मित्र’, ‘नोक-झोंक’ जैसी पत्रिकाओं में प्रकाशित व्यंग्य चित्रों और कार्टूनों ने
राष्ट्रीय आंदोलन को जनसामान्य तक पहुँचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। बनारस और
लखनऊ जैसे नगर हिंदी कार्टून पत्रकारिता के प्रमुख केंद्र रहे। इस काल में
कार्टूनिस्टों का मुख्य उद्देश्य जनता में राजनीतिक जागरूकता उत्पन्न करना और
औपनिवेशिक सत्ता की विसंगतियों को उजागर करना था।
आज़ादी के बाद हिंदी पत्रकारिता में
कार्टूनिस्टों की भूमिका
स्वतंत्रता के पश्चात हिंदी पत्रकारिता में कार्टूनिस्टों
की भूमिका का स्वरूप परिवर्तित हुआ। अब कार्टून औपनिवेशिक सत्ता के विरोध से आगे
बढ़कर लोकतांत्रिक व्यवस्था में सत्ता की निगरानी करने लगे। इस दौर में
कार्टूनिस्ट ‘वॉचडॉग’ की भूमिका में सामने आए, जो सरकार, राजनीति और
नौकरशाही की कार्यप्रणाली पर सतत निगरानी रखते थे।
केशव शंकर पिल्लई (शंकर) ने भारतीय कार्टून को संस्थागत
पहचान दी। हिंदुस्तान टाइम्स और बाद में शंकरर्स वीकली के माध्यम से
उन्होंने राजनीतिक व्यंग्य को पत्रकारिता का अभिन्न अंग बनाया। उनके कार्टून सत्ता
की आलोचना करते हुए भी संतुलन और सौम्यता बनाए रखते हैं।
आर.के. लक्ष्मण ने ‘कॉमन मैन’ के माध्यम से स्वतंत्र भारत
के आम नागरिक की पीड़ा, विवशता और विडंबनाओं को स्थायी प्रतीक के रूप में स्थापित किया। लक्ष्मण
का आम आदमी अक्सर मूक रहता है, किंतु उसकी मौन उपस्थिति
व्यवस्था की असंवेदनशीलता को प्रभावी ढंग से उजागर करती है।
हिंदी के प्रमुख कार्टूनिस्ट और उनके
विषय
हिंदी पत्रकारिता को समृद्ध करने वाले प्रमुख कार्टूनिस्टों
में शंकर, आर.के. लक्ष्मण, काक, सुधीर
तैलंग, कुट्टी, आबू अब्राहम और रंगा
जैसे नाम उल्लेखनीय हैं। इन कार्टूनिस्टों ने अपने-अपने समय की सामाजिक और
राजनीतिक समस्याओं को कार्टून के माध्यम से प्रस्तुत किया।
जहाँ शंकर और लक्ष्मण ने सत्ता, राजनीति और नौकरशाही की
विसंगतियों को उजागर किया, वहीं सुधीर तैलंग ने समकालीन
राजनीति पर करुणा और व्यंग्य का संतुलन बनाए रखा। उनके कार्टून आलोचनात्मक होते
हुए भी मानवीय संवेदना से जुड़े रहते हैं।
हिंदी पत्रकारिता में काक का विशिष्ट
योगदान
हिंदी पत्रकारिता में कार्टूनिस्ट काक (हरिश्चंद्र शुक्ल)
का योगदान विशेष रूप से उल्लेखनीय है। वे उन दुर्लभ कार्टूनिस्टों में हैं
जिन्होंने मुख्यतः हिंदी भाषा के समाचार पत्रों के माध्यम से राष्ट्रीय पहचान
बनाई। उनके कार्टूनिस्ट जीवन की शुरुआत 1967 में दैनिक जागरण से हुई और इसके
बाद उन्होंने दिनमान, शंकर्स वीकली, साप्ताहिक हिंदुस्तान, नवभारत टाइम्स और जनसत्ता जैसे प्रतिष्ठित समाचारपत्रों में निरंतर कार्य किया।
काक के कार्टूनों की केंद्रीय विशेषता उनका जनसरोकार है।
जमीनी स्तर पर जनता की समस्याओं की गहरी समझ के कारण उन्हें “जनता का कार्टूनिस्ट”
कहा जाता है। उनके कार्टूनों में ग्रामीण भारत, मध्यवर्गीय संघर्ष, महँगाई,
बेरोज़गारी, भ्रष्टाचार और राजनीतिक पाखंड
प्रमुख विषय हैं।
काक द्वारा प्रस्तुत ‘आम आदमी’ लक्ष्मण के आम आदमी से भिन्न
है। वह मूक दर्शक नहीं, बल्कि मुखर टीकाकार है, जो सत्ता और व्यवस्था से
सवाल करता है। यह मुखरता काक के कार्टूनों को केवल दृश्यात्मक टिप्पणी नहीं,
बल्कि प्रतिरोध की अभिव्यक्ति बनाती है।
समकालीन हिंदी पत्रकारिता और कार्टून
डिजिटल युग में हिंदी पत्रकारिता के स्वरूप में परिवर्तन
आया है, किंतु कार्टून की प्रासंगिकता बनी हुई है। आज भी अनेक कार्टूनिस्ट प्रिंट
और डिजिटल माध्यमों के माध्यम से सामाजिक और राजनीतिक मुद्दों पर व्यंग्यात्मक
टिप्पणी कर रहे हैं। डिजिटल मंचों ने कार्टून की पहुँच को और व्यापक बनाया है।
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